गोपेश्वर। बदरीनाथ मंदिर में चढावा गबन मामले को लेकर सनातनियों की आस्था पर पहुंची चोट के चलते अब एक बार फिर व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम् प्रबंधन बोर्ड का जिन्न बाहर आ गया है। इसके चलते एक बार फिर उत्तराखंड में देवस्थानम् बोर्ड के अस्तित्व को लौटाने के के लिए जोरदार बहस छिड़ गई है।
दरअसल उत्तराखंड राज्य की त्रिवेंद्र रावत सरकार ने दिसंबर 2019 में उत्तराखंड के चारधामों की व्यवस्था में सुधार लाने के लिए एतिहासिक फैसला लेते हुए उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम् प्रबंधन बोर्ड से संबंधित विधेयक विधानसभा में पारित करवाया था। हालांकि शुरूआती दौर में भी पुजारी, पंडा तथा हकहकुकधारी इस विधेयक के विरोध में आ खड़े हो गए थे। इसके बावजूद तत्कालीन सरकार तमाम विरोध के बीच अपने फैसले पर अड़ी रही। जाने माने अधिवक्ता व तत्कालीन भाजपा सांसद सुब्रमण्यम् स्वामी द्वारा सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने के बाद सरकार देवस्थानम् बोर्ड को लेकर ऊहापोह की स्थिति में आ खड़ी हो गई थी। यही वजह है कि चारधाम यात्रा के संचालन तथा मंदिरों के अधिग्रहण को लेकर सरकार सक्रिय नहीं हो पाई थी। देवस्थानम् बोर्ड न तो पूर्ववर्ती बदरीनाथ तथा केदारनाथ मंदिरों के व्यवस्थाओं के संचालन में न तो उत्साह दिखाई दे रहा था और ना ही गंगोत्री तथा यमुनोत्री धामों की व्यवस्था को संभालने में कदम बढ़ाये जा रहे थे। तब सरकार इस मामले को लेकर पूरी तरह ऊहापोह की स्थिति में रही। हाईकोर्ट ने देवस्थानम् बोर्ड गठन पर फैसला देते हुए अपनी कानूनी मुहर लगा दी थी तो तब देवस्थानम् बोर्ड की चुनौतियों का सफर भी शुरू हो गया था। वैसे भी व्यवस्था संचालन के लिए बोर्ड में समाहित हुई श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के करीब 700 अधिकारी तथा कर्मचारी भी पसोपेश में पड़ गए थे। हालांकि इस व्यवस्था के चलते सरकार सधे कदमों के साथ आगे बढ़ी और बोर्ड ने चारधाम यात्रा संचालन का बीड़ा उठा दिया। तत्कालीन दौर में गंगोत्री तथा यमुनोत्री धामों की व्यवस्था बनाने में बोर्ड प्रबंधन को अग्नि परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ा। ऐसा इसलिए कि बीकेटीसी के अधीन यमुनोत्री तथा गंगोत्री मंदिरों का संचालन नहीं होता था। इसके बावजूद पुरानी बीकेटीसी के अमले को गंगोत्री तथा यमुनोत्री में भी झोंक दिया गया। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई। यह अलग बात है कि विरोध करने वालों को राहत नहीं मिल पाई। कहा जाता है कि त्रिवेंद्र रावत सरकार ने बदरीनाथ केदारनाथ, गंगोत्री तथा यमुनोत्री से संबंधित 51 मंदिरों को बोर्ड के अधीन ला दिया था। त्रिवेंद्र रावत की विदाई के बाद बोर्ड को भंग करने की मांग उठती रही। इसके लिए जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होते रहे। फिर तीरथ सिंह रावत की सरकार ने बोर्ड का अस्तित्व समाप्त कर दिया। इस तरह बीकेटीसी फिर अस्तित्व में आ गई और गंगोत्री तथा यमुनोत्री मंदिरों की व्यवस्था का संचालन पूर्व की भांति स्वतंत्र रूप से चला आ रहा है। अब जबकि बदरीनाथ धाम में दान चोरी का मामला राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया है तो एक बार फिर व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए चारधाम देवस्थानम् बोर्ड को अस्तित्व में लाने को बहस शुरू हो गई है।
हरिद्वार के सांसद व पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तो बदरीनाथ दान गबन मामले को लेकर जांच की मांग जोरदार ढंग से उठाते हुए चारधाम देवस्थानम् बोर्ड के अस्तित्व को लौटाने का राग छेड दिया है। यहां तक कि मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने भी बदरीनाथ धाम में दान गबन मामले को लेकर कड़ा रूख अपनाते हुए इस मामले की जांच गढ़वाल कमिश्नर की अध्यक्षता में गठित की तीन सदस्यीय हाईपावर कमेठी को सौंप दी है। यही नहीं संबंधित आरोपी कर्मचारी प्रमोद नौटियाल के निलंबन के साथ ही चोरी का मुकदमा भी दर्ज करवा दिया है। पुलिस मामले की जांच में जुट गई है। सीएम धामी ने तो यहां तक कह दिया है कि मंदिरों में चोरी गौ हत्या और माता पिता की हत्या के समान है। इससे समझा जा सकता है कि सीएम धामी के तेवर इस मामले में काफी सख्त हैं। कांग्रेस ने तो मामला ही लपक लिया है। बीकेटीसी के पूर्व अध्यक्ष व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल समेत अन्य विपक्षी दल इस मामले को लेकर सरकार की घेराबंदी में जुटे हुए हैं। इस मामले के साथ ही अब केदारनाथ के सोना प्रकरण को भी हवा दी जा रही है। वैसे इस मामले में गढ़वाल कमिश्नर की अध्यक्षता में आयोजित जांच कमेटी ने 22 किग्रा सोना लेपन मामले में क्लीन चिट देकर इस विवाद को समाप्त कर दिया था।
क्या है देवस्थानम् बोर्ड एक्ट
बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री तथा यमुनोत्री तथा उनके अधीनस्थ तथा आसपास के 51 मंदिरों में अवस्थापना सुविधाओं का विकास, समुचित यात्रा संचालन एवं प्रबंधन के लिए उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम् प्रबंधन बोर्ड का गठन किया गया था। बोर्ड के अध्यक्ष मुख्यमंत्री जबकि धर्मस्व व संस्कृति मामलों के मंत्री को बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया था। मुख्य सचिव, सचिव पर्यटन, सचिव वित्त व संस्कृति विभाग भारत सरकार के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी पदेन सदस्य बनाए गए थे। टिहरी रियासत के राज परिवार के एक सदस्य, हिंदू धर्म का अनुशरण करने वाले तीन सांसद, हिंदू धर्म का अनुशरण करने वाले छह विधायक, राज्य सरकार द्वारा चार दानदाता, हिंदू धर्म के मामलों का अनुभव रखने वाले व्यक्ति, पुजारियों, वंशानुगत पुजारियों के तीन प्रतिनिधि इसमें शामिल किए गए थे। चारधाम देवस्थानम् अधिनियम चारधाम और उनके आसपास के मंदिरों में सुधार के लिए बनाया गया था। चारधाम आने वाले यात्रियों का स्वागत सत्कार तथा बेहतर सुविधाएं देने और भविष्य की जरूरतों को पूरा करना ही बोर्ड के गठन का उद्देश्य रहा है।
चारधाम देवस्थानम् बोर्ड के कार्य
देवस्थानम् बोर्ड में शामिल किए गए मंदिरों के प्रबंधन के लिए उच्चतम संस्था के बतौर संपूर्ण टाउनशीप विकसित करना रहा है। मंदिरों में होने वाले खर्चों तथा किए जाने वाले कार्यों के बजट का अनुमोदन भी उद्देश्य में शामिल किया गया। मंदिरों में निहित संपत्ति, आभूषण आदि के रखरखाव व संरक्षण को बढ़ावा देना, कार्मिकों को पारिश्रमिक, वेतन एवं भत्ते आदि निश्चित कर चारधाम निधि से भुगतान का अनुमोदन करने की व्यवस्था बनाई गई थी। मंदिरों तथा उसके तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए कुशल प्रबंधन एवं पर्यवेक्षण, पुजारी, पंडा, न्यासी तथा हकहकूधारियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने के साथ ही धार्मिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के कामों को बोर्ड के अधीन लाया गया था। इसके तहत 24 फरवरी 2020 को तत्कालीन सचिव रविनाथ रमन को देवस्थानम बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी का दायित्व सौंपा गया था। इससे माना जा रहा था कि अब धामों की व्यवस्था पटरी पर लौट आएगी किंतु विरोध के चलते ऐसा हो न सका।
अब जबकि उत्तराखंड के चारधामों में व्यवस्था जबाव देने लगी है तो बोर्ड का जिन्न भी बहस का मुद्दा बन गया है। ऐसा इसलिए भी कि बदरीनाथ धाम में बैंकों द्वारा दिए गए लेपटाप भी गायब होने का मामला प्रकाश में आने के चलते अब व्यवस्था को नए ढंग से संचालित करने की चुनौती आ खड़ी हो गई है। वैसे बदरीनाथ तथा केदारनाथ मंदिरों और अधीनस्थ मंदिरों के प्रबंधन को लेकर बीकेटीसी को समाप्त कर बदरी-केदार प्रबंधन बोर्ड का प्रस्ताव मार्च माह में पारित किया गया था। प्रस्ताव को शासन को भेजा जा चुका है। नाम बदलने के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि प्रत्येक मंदिर की अपनी समिति है। बदरी-केदार प्रबंधन बोर्ड से गरिमा बढ़ेगी और कामकाज अधिनियम के अनुसार ही होंगे। बोर्ड का कार्यकाल तीन साल से बढ़ा कर पांच साल करने तथा सदस्यों की संख्या दस से बढ़ा कर 15 करने का प्रस्ताव किया गया है। बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी का कहना है कि प्रस्ताव पारित करने में तीर्थ पुरोहितों ने भी हामी भरी है। वैसे भी ब्रिटिश काल में 1939 में बने अधिनियम के तहत बीकेटीसी अस्तित्व में है। अब चूंकि चारधाम देवस्थानम् बोर्ड का जिन्न बाहर आ गया है तो इस मसले में हर तरफ देवस्थानम् बोर्ड पर भी हामी भरी जानी लगी है। सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म पर तो देवस्थानम् बोर्ड के पेरोकारों की बाढ सी आ गई है।
उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम् प्रबंधन बोर्ड का जिन्न फिर बाहर आया
