गोपेश्वर। उत्तराखंड में कृषि भूमि का आकार लगातार घटता जा रहा है। इसके चलते भविष्य में कृषि भूमि का संकट खड़ा होने के आसार बढ़ गए हैं।
दरअसल वर्ष 2000 में राज्य गठन के समय कृषि क्षेत्रफल 1.77 लाख हेक्टेयर था। इसमें शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल 7.70 लाख हेक्टेयर तथा परती भूमि (बंजर) 1.07 लाख हेक्टेयर थी। मौजूदा दौर में कृषि भूमि की जोत घट कर 7.3 लाख हेक्टेयर रह गई है। इसमें शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल 5.27 लाख तथा परती भूमि 2.08 लाख हेक्टेयर रह गई है। कहा जा सकता है कि शुद्ध बोया क्षेत्र में 2.43 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। कुल कृषि भूमि में 1.42 लाख हेक्टेयर की कमी इस बात को रेखांकित करती है कि भविष्य में कृषि जोत का संकट खड़ा हो सकता है। शहरीकरण एवं आवासीय सुविधाओं की बढ़ती मांग और औद्योगिक परियोजन से भूमि में परिवर्तन हो रहा है। एक दौर में खास कर पहाड़ के लोग कम जोत में ही अपनी आजीविका का कृषि के जरिए निर्वहन करते थे। मौजूदा दौर में होटल, लाॅज तथा अन्य तरह के भवन खड़ा करने की होड़ में कृषि भूमि का आकार लगातार घटता जा रहा है। यह स्थिति चिंता के रूप में सामने आ रही है। वैसे कृषि भूमि को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर विभाग की ओर से मिलेट पालिसी, सेब की अति सघन बागवानी योजना, कीवी पालिसी, ड्रैगन फू्रट पालिसी, संगध खेती के लिए महक क्रांति पालिसी के जरिए किसानों को योजनाओं से लाभान्वित करने की पहल की जा रही है। केंद्र पोषित योजनाओं तथा राज्य सेक्टर की अन्य योजनाओं के जरिए भी कई कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं। इसके बावजूद लोगों का ध्यान आवासीय मकानों के विस्तार, होटल, लाॅज और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को खड़ा करने की होड़ मची है। इसके चलते ही कृषि क्षेत्र का दायरा धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। कृषि भूमि को अकृषि करने को तहसीलों में लगी कतार भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं कही जा सकती।
वर्ष 2024-25 के राजस्व परिषद से प्राप्त भूमि उपयोगिता के आकंडों के अनुसार जनपदवार कृषित भूमि 7.35 लाख हेक्टेयर रह गई है। इसमें शुद्ध बोया क्षेत्रफल 5.27 लाख तथा परती भूमि 2.08 लाख हेक्टेयर शामिल है। चमोली जिले में तो वास्तविक बोया क्षेत्रफल 28433 हे. तथा परती भूमि 5376 हेक्टेयर है। इस तरह कुल कृषि क्षेत्रफल 33809 हेक्टेयर है। देहरादून की बात करें तो कुल कृषि क्षेत्रफल 52459 हेक्टेयर में है। हरिद्वार में 121408 हेक्टेयर, पौड़ी गढ़वाल में 75168, रूद्रप्रयाग में 20678, टिहरी गढ़वाल 56953, अल्मोडा में 68762, उत्तरकाशी में 29632, बागेश्वर में 22402, चंपावत में 24957, नैनीताल में 45318, पिथौरागढ में 48851 तथा उद्यमसिंह नगर में 141821 हेक्टेयर शामिल हैं। इनमें 208085 हेक्टेयर परती भूमि शामिल है। इस तरह वास्तविक बोया गया क्षेत्रफल 527133 हेक्टेयर यानि 5.27 लाख है। इसमें 2.08 लाख परती भूमि शामिल है।
कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग की ओर से विभिन्न केंद्र पोषित योजनाओं यथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री कृषि विकास योजना, मिशन आॅन एग्रीकलचर एक्सटेंशन (आत्मा) तथा राज्य सेक्टर और जिला योजना के तहत बीज, कीटनाशक, कृषि यंत्र, सिंचाई सुविधाएं आदि उपलब्ध कराई जा रही है। यह सब कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने को किया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से कृषि भूमि का एक बड़ा भूभाग असुविधाओं के चलते बंजर भी होता जा रहा है। इसके मूल में जंगली जानवरों द्वारा फसलों को रौंदने से भी लोगों का खेती से मोह भंग हो चला है। पलायन को भी इसका एक प्रमुख कारण माना जा सकता है। हालात यही रहे तो भविष्य में कृषि भूमि के बंजर पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यह स्थिति दर्शाती है कि उत्तराखंड कृषि और उद्यान के क्षेत्र में पिछड़ता जा रहा है। हिमाचल के मुकाबले उत्तराखंड की कृषि आधारित भूमि आर्थिक तौर पर लोगों को सशक्त नहीं बना पा रही है। नीति नियंताओं ने यदि इस ओर मुंह फेरे रखा तो भविष्य के खतरे कम नहीं हैं।
चिंताः उत्तराखंड में घटता जा रहा कृषि भूमि का आकार
