विधानसभा चुनाव में सीएम धामी ही होंगे भाजपा के खेनवहार

विधानसभा चुनाव में सीएम धामी ही होंगे भाजपा के खेनवहार

गोपेश्वर। तो लगता है उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ही भाजपा के खेवनहार होंगे। इसके चलते अब धामी को एक और अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा।
दरअसल 2021 में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की विदाई कर मुख्यमंत्री की कमान खटीमा के विधायक पुष्कर सिंह धामी को सौंपी थी। धामी ने शुरूआती दौर में ही जोरदार बैटिंग की और भाजपा 2017 के बाद 2022 के विधानसभा के चुनाव में 47 सीटों के साथ दोबारा सत्ता में लौट आई। यह अलग बात है कि धामी खटीमा से स्वयं चुनाव हार गए। इसके बावजूद प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौटी भाजपा की जीत का श्रेय धामी को ही मिला। इसके चलते हाईकमान ने धामी को ही सीएम की गद्दी सौंप दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह के दुलारे बने धामी ने फिर बैटिंग शुरू की। हालांकि उत्तराखंड में राजनैतिक अस्थिरता की शुरूआती दौर से चली आ रही परंपरा के तहत माना जा रहा था कि वह कुछ ही दिनों तक कुर्सी पर टिके रहेंगे। इसके बावजूद धामी ने केंद्रीय नेतृत्व के हिसाब से पारी खेलना शुरू किया। केंद्रीय नेतृत्व को उनकी कार्यप्रणाली इस कदर भा गई कि अब वह पूरी तरह भाजपा की सियासत में अजेय योद्धा के रूप में स्थापित होकर रह गए हैं।
अब तक धाकड़ धामी के रूप में प्रचारित हो रहे धामी को केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हल्द्वानी की जनसभा में धुंरधर धामी के तकमें से नवाज दिया। इसी दौर में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने धामी की कार्यप्रणाली से प्रसन्न होकर उनकी पीठ खूब थपथपाई। यहां तक कि मंत्रीमंडल विस्तार को भी धामी के हवाले कर दिया। धामी ने मंत्रीमंडल विस्तार में क्षेत्रीय संतुलन बनाकर मंत्रीमंडल का आकार भी पूरा कर दिया। कई भाजपाई दायित्वधारी बनने की आस लगाए बैठे थे तो धामी ने उनके मन की मुराद भी पूरी कर ली। यहां तक की देहरादून में हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएम धामी की तारीफों के पुल बांध दिए। इस तरह कहा जा सकता है कि उत्तराखंड में सीएम की कुर्सी की अस्थिरता का दौर भी एक तरह से समाप्त हो गया है। अब यही कहा जा सकता है कि उत्तराखंड में विधानसभा का चुनाव धामी के नेतृत्व में ही लडा जाएगा। इस तरह धामी भाजपा की सियासत में एक शक्तिशाली नेता के रूप में स्थापित हो गए हैं।
वैसे भी उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भाजपा की सियासत डगमगाती रही है। वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद नित्यानंद स्वामी को सीएम की कमान सौंपी गई और कुछ समय बाद उन्हें चलता कर दिया गया। इसके बाद कुछ समय के लिए भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन कर दिया गया। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में लौटी तो नारायण दत्त तिवारी को सीएम की कुर्सी नसीब हुई। इस पद पर हालांकि तिवारी पांच साल तक काबिज रहे किंतु इस बीच उनके अपने ही दल के विरोधी उनकी कुर्सी को हिलाते रहे। वर्ष 2007 में भाजपा की सत्ता में वापसी हुई और तत्कालीन सांसद भुवन चंद्र खंडूरी को सीएम की कुर्सी हासिल हुई। राजनैतिक अस्थिरता के दौर में वह अपनी गाड़ी खींच ही रहे थे कि भाजपा में बगावत की स्थिति पैदा हो गई। इसके चलते डा. रमेश पोखरियाल निशंक को गद्दी सौंप दी गई। कुछ समय बाद उन्हें भी चलता कर दिया गया और फिर खंडूरी को कमान मिली। 2012 का चुनाव खंडूरी के नेतृत्व में भाजपा ने लड़ा। इस चुनाव में खंडूरी स्वयं चुनाव तो हारे ही अपितु पार्टी भी सत्ता से बाहर हो गई। फिर कांग्रेस का दौर आया और विजय बहुगुणा को कुर्सी नसीब हुई। राजनैतिक अस्थिरता के बीच उन्हें दो साल बाद कुर्सी से चलता कर दिया गया। हरीश रावत को सीएम की कमान सौंपी गई। वह भी कांग्रेस के कुनबे को नहीं संभाल पाए। इसके चलते 2016 में नौ विधायक विद्रोह कर भाजपा में जा मिले। 2017 में भाजपा सत्ता में लौटी तो त्रिवेंद्र रावत को मुख्यमंत्री पद पर आसीन कर लिया गया। उन्हें भी लगातार राजनैतिक अस्थिरता का शिकार होना पड़ा। मार्च 2021 में उनकी भी विदाई हुई। फिर तीरथ सिंह रावत को सीएम की कमान मिली। वह चार माह ही इस पद पर रहे। इसके बाद पुष्कर सिंह धामी का युग लौट आया और वह अभी तक इस पद आसीन हैं। अब आगे का चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाना है। कहा जा सकता है कि धामी भाजपा में अपने विरोधियों को पछाड कर सर्वशक्तिमान नेता के रूप में स्थापित होकर रह गए हैं। अब विधानसभा चुनाव में उन्हें भाजपा की सत्ता वापसी की कसरत में जुटना होगा। ऐसा होता है तो वह पांच साल से अधिक का कार्यकाल तो पूरा करेंगे ही अपितु आगे की पारी भी खेल सकेंगे।

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