यूकेडी में एक बार फिर युवा तुर्कों को हासिए पर धकेलने की जंग !

गोपेश्वर। उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) में युवा तुर्कों में सुमार केंद्रीय उपाध्यक्ष आशुतोष नेगी को दल विरोधी गतिविधियों के चलते 6 साल के लिए निष्कसित कर दिया गया है। इसके चलते यूकेडी में एक बार फिर युवा तुर्कों को हासिए पर धकेलने के लिए पुरानी पीढ़ी के नेताओं ने जंग छेड दी है।
दरअसल 25 जुलाई 1979 को क्षे़त्रीय दल के रूप में अस्तित्व में आए उक्रांद ने हर दौर में एक दूसरे को ठिकाने लगाने के लिए जंग छिड़ती रही है। इसके चलते उक्रांद कभी भी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित नहीं हो पाया। पुराने दौर में भी उक्रांद के मठाधिशों के बीच वर्चस्व की जंग चलती रही। इस कारण उक्रांद कई बार फाड़- फाड़ भी होता रहा। यही वजह है कि राष्ट्रीय दलों का विकल्प बनने का दावा करने वाली यूकेडी कभी भी इन दलों के लिए चुनौती देने की स्थिति में नही रही।
मौजूदा दौर में जबकि 2027 में उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं तो तैयारियों केा लेकर भाजपा तथा कांग्रेस जोरदार प्रयासों में जुटे हुए हैं। इस बार दोनो राष्ट्रीय दलों की रीति नीति से नाराज लोग उक्रांद की ओर टकटकी निगाहें लगाए बैठे थे कि अब उक्रांद में युवा तुर्कों को हासिए पर धकेलने की कोशिशो के चलते लोग मायूस होने लगे हैं। यूकेडी के युवा तुर्कों में शामिल आशुतोष नेगी को दल विरोधी बयानबाजी के चलते 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया गया है। आशुतोष नेगी युवा तुर्कों मंे शाामिल होने के चलते अपने अन्य युवाओं के साथ मिलकर विकल्प देने का भरोसा जगा रहे थे। इसके बावजूद हालात अब एक बार फिर पुराने दौर को रिपीट करने लगे हैं। वैसे भी एक दौर में उक्रांद के थिंक टैंक माने जाने वाले विपिन त्रिपाठी के बेटे पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी भी यूकेडी की सियासत में हासिए पर चल रहे हैं। पुष्पेश भी उक्रांद की युवा पीढ़ी के नेताओं में शामिल हैं।
वैसे भी उक्रांद मंे काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भट्ट तथा त्रिवेंद्र पंवार ने आपसी तालमेल न होने के चलते दल रसातल की ओर जाता रहा। हालांकि एक दौर में प्रीतम पंवार भी उक्रांद की सियासत के केंद्र बिंदु में आ गए थे किंतु कांग्रेस का समर्थन करने के चलते वे भी हासिए पर चले गए। इसके चलते उन्होनें उक्रांद को अलविदा कर भाजपा का दामन थामा। दिवाकर भट्ट ने भी 2007 में भाजपा को समर्थन दिया तो कैबिनेट मंत्री के रूप में उन्होने सत्ता का सुख भोगा। 2012 में तो उन्होने यूकेडी के टिकट पर न लडकर अलायंस पार्टनर के रूप में भाजपा के सिंबल पर ही चुनाव लड़ा। खंड- खंड होती यूकेडी को संभालने के लिए कोई सर्वमान्य नेता नहीं उभर पाया। इसके चलते ही उक्रांद का चुनाव चिन्ह ’कुर्सी’ भी दल के हाथ से फिसल पड़ा। इस मामले को लेकर भी कहीं कोई पहल दिखाई नही दी। यह मामला चुनाव आयोग के साथ ही न्यायालय तक पहुंचा किंतु अभी तक भी कुर्सी का चुनाव चिन्ह फ्रीज चल रहा है। आशुतोष नेगी के निष्कासन के पश्चात यूकेडी के जरिए विधानसभा की देहरी तक पहुंचने की जद्दोजहद में जुटे तमाम युवा तुर्कों को एक बार फिर झटका सा लग गया है। बताया जा रहा है कि अन्य तमाम युवा नेता दावेदारी कर जन सरोकारों से जुडे सवालों को लेकर संघर्ष और जन संपर्क के जरिए लोगों को भाजपा तथा कांग्रेस का विकल्प देने का भरोसा जगाने में लगे हैं। मौजूदा सियासी घटनाक्रम ने उनकी उम्मीदों को भी झटका दे दिया है। अन्य तमाम युवा तुर्कों को भी साइडलाइन करने की भी आशंका बनी हुई है। यह स्थिति यूकेडी के लिए शुभ संकेत के रूप में नहीं कही जा सकती। यूकेडी में चल रहे आंतरिक द्वंद को लेकर भाजपा तथा कांग्रेस के रणनीतिकारो के चेहरे खिल उठने लगे हैं। इससे आम जनता में यह संदेश जाने लगा है कि विकल्प देना तो दूर चुनाव से पहले ही दल में वर्चस्व की जंग एक बार फिर छिड़ गई है।
उक्रांद के केंद्रीय प्रवक्ता सत्य प्रकाश सती का कहना है कि पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते नेतृत्व का यह फैसला गलत नहीं कहा जा सकता। ऐसा इसलिए कि किसी भी दल में व्यक्ति के बजाय दल बडा होता है। इसलिए दल विरोधी गतिविधियों से दल को ही नुकसान पहुंचने का अंदेशा बन गया था। सोशल मीडिया पर यूकेडी के युवा तुुर्क नेतृत्व के इस फैसले पर हैरानी जता रहे हैं। युवा तुर्को का साफ तौर पर कहना है कि आशुतोष की दल में सम्मानजनक वापसी होनी चाहिए। इस तरह के कदमों से दल आम जनता को भाजपा तथा कांग्रेस का विकल्प बनने का भरोसा जगाने में सफल हो सकेगा।
इस तरह यूकेडी में युवा तुर्कों को हासिए पर धकेलने की कोशिशों से यूकेडी के प्रति लोगों का विकल्प देने का भरोसा एक बार फिर डगमगाने लगा है। स्थायी राजधानी गैरसैंण , मूल निवास, बेरोजगारी समेत तमाम स्थानीय मुद्दों को लेकर लोगो की जुबां पर इस बार यूकेडी छाई हुई थी। इस तरह के हालातों से तो सियासी असमंजस के हालात बन गए हैं। अब देखना यह है कि यूकेडी के रणनीतिकार इस तरह की फजीहत से बचने के लिए किस तरह के कदमों के साथ आगे बढ़ते है। इस पर ही यूकेडी का सियासी सफर निर्भर करेगा।

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