रजपाल बिष्ट
गोपेश्वर। हिमालयी महाकुंभ के रूप में विख्यात श्री नंदादेवी राजजात यात्रा का आयोजन कभी भी निर्धारित अवधि पर नहीं हो पाया। महाकुंभ तथा अर्द्धकुंभ तो अपनी निर्धारित अवधि पर संपादित होते रहे हैं किंतु हिमालयी की नंदादेवी राजजात यात्रा 12 वर्ष की अवधि पर कभी भी आयोजित नहीं हो पाई। कहा जा सकता है कि हर 12 वर्ष में बहुप्रचारित श्री नंदादेवी राजजात यात्रा का आयोजन अपरिहार्य कारणों से निर्धारित अवधि पर नहीं हो पाया। अब इस मसले को लेकर धर्म जगत में बहस छिड़ गई है।
बताते चलें कि श्री नंदादेवी राजजात यात्रा की हर 12 साल में होने के दावे अब तक श्री नंदादेवी राजजात समिति की ओर से किए जाते रहे हैं। गढ़वाल के कांसुवा के राजकुंवरों द्वारा दोष निवारण के निमित हर 12 वर्ष में आयोजित की जाने वाली राजजाव यात्रा कभी भी अपने निश्चित अवधि के दावों पर खरी नहीं उतरी है। वर्ष 2014 में राजजात यात्रा संचालित हुई थी। इसके तहत इस साल नंदा राजजात यात्रा का आयोजन होना था किंतु अब मलमास तथा अन्य मौसमीय कारणों और सुविधाओं की बहाली को कारण बताते हुए इस साल की राजजात यात्रा को स्थगित कर दिया गया है। अगले साल यानि 2027 में राजजात यात्रा संचालित करने का भी इरादा जाहिर किया गया है। वैसे 2012 में भी नंदा राजजात को होना था। इस यात्रा को संपन्न करने के लिए पहले ही तमाम तरह की धार्मिक प्रक्रियाओं को अंजाम दिया गया था। इसके तहत यात्रा के आयोजन से पूर्व ही मौडिवी की प्रक्रिया को भी नवम्बर 2010 में संपन्न कर लिया गया था। माना जाता है कि राजजात यात्रा से पूर्व मौडिवी के आयोजन से ही यह यात्रा सफल होती है। तत्कालीन दौर में 2012 की तैयारियों के लिए डेढ़ साल पूर्व ही मुहूर्त निकालने की तैयारियों की गई थी। इसके तहत नौटी में जब 2012 के लिए बहुप्रचारित इस यात्रा को लेकर मुहूर्त निकालने की घोषणा की गई तो पूरे राज्य के लोग इस अवसर पर घोषित की जाने वाली तिथि पर टकटकी लगाये बैठे थे। 2012 में राजजात यात्रा को स्थगित करने की घोषणा की गई तो तब राजजात में शामिल होने के लिए आतुर लोगों को भारी निराशा ही हाथ लगी।
वैसे आयोजकों द्वारा हर 12 वर्ष में नंदा देवी राजजात के आयोजन को लेकर दावे किए जाते रहे हैं। यह अलग बात है कि राजजात कभी भी हर 12 वर्ष में आयोजित नहीं हो पाई। नंदादेवी राजजात अनादिकाल से चली आ रही है। अतिवृष्टि के कारण रूप कुंड में पड़े नर कंकाल इस बात की पुष्टि करते हैं कि पौराणिक काल मे भी यह यात्रा चलती थी। अब तक के ज्ञात इतिहास अनुसार 1843 में भी यात्रा आयोजित हुई थी। फिर 20 साल बाद 1863 में यात्रा के आयोजन की जानकारी मिलती है। इसके बाद 1886 यानि 23 साल बाद यात्रा का आयोजन किया गया था। इसी तरह 19 साल बाद 1905 में राजजात यात्रा का आयोजन किया गया था। इसके 20 साल बाद सन 1925 में राजजात यात्रा संपन्न हो पाई थी। राजजात यात्रा का इतिहास यह भी बताता है कि तब भी हर 12 वर्ष में राजजात यात्रा आयोजित करने की पहल परवान नहीं पाई थी। यही वजह है कि 1925 के बाद 26 साल के लंबे अंतराल के पश्चात 1951 में राजजात की प्रक्रिया फिर एक बार आगे बढ़ी थी। इसके पश्चात माना जा रहा कि राजजात यात्रा 1963 में आयोजित होकर एक बार फिर अपने तय समय के अनुसार ढ़र्रे पर लौट आएगी। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। फिर 17 साल बाद सन 1968 में राजजात यात्रा संभव हो पाई। इसके पश्चात ऐसा समय गुजरा की राजजात यात्रा के आयोजन के लिए कांसुवा के राजवंशीय कुंवरों को काफी समय गुजरने के बाद इस राजजात यात्रा की याद आई और 19 साल के लंबे अंतराल के बाद यह राजजात यात्रा 1987 में आयोजित हो पाई। माना जा रहा था कि 1999 में राजजात यात्रा आयोजित होगी किंतु उस वक्त भी यह यात्रा समय पर नहीं हो पाई। इस तरह 13 वर्षों के लंबे अंतराल के पश्चात वर्ष 2000 में नंदा राजजात संपन्न हो पाई।
धार्मिक प्रक्रियाओं के तहत वर्ष 2012 में अपने तप समय के अनुसार यात्रा को आयोजित करने के लिए आयोजन समिति के आग्रह पर राज्य सरकार भी इसकी तैयारियों के लिए आगे बढ़ गई थी किंतु जब फरवरी 2012 में घोषित मुहूर्त के अनुसार 2013 में यात्रा घोषित करने की घोषणा की गई तो लोग मायूस हो चले। घोषित मुहूर्त के अनुसार यह यात्रा अपने 12 वर्ष के तय समय से एक साल बाद यानि 13 वर्ष बाद 2013 में आयोजित करने का ऐलान हुआ था। 2013 में केदारनाथ समेत उत्तराखंड में आपदा की त्रासदी के चलते इस यात्रा पर दैवीय आपदा का ग्रहण लगा। इस तरह 2014 में नंदादेवी राजजात यात्रा का संचालन हुआ तो इस यात्रा में उमड़ी भीड़ ने सारे रिकार्ड तोड़े और 280 किमी की लंबी पैदल यह यात्रा विश्व विख्यात हो गई।
इस तरह अब 12 साल बाद यानि मौजूदा 2026 के साल में लोगों को हिमालयी महाकुंभ के रूप में प्रचलित इस यात्रा का बेसब्री से इंतजार बना था। इसी बीच नंदा सिद्धपीठ कुरूड के नंदकेसरी तक के पड़ावों को राजजात यात्रा के कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है। ऐसी उपेक्षा पहले भी की गई थी। राजजात यात्रा में नंदकेसरी से कुरूड़ की मां नंदादेवी ही यात्रा का नेतृत्व करती है जबकि कांसुवा-नौटी से चैसिंग्या खाडु और छंतौलियां ही यात्रा को जाती हैं। इस पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। राजजात यात्रा मैप में कांसुवा-नौटी के पड़ावों को ही रेखांकित किया गया है।
हालांकि कांसुवा के कुंवरों ने राजजात स्थगित करने की घोषणा कर दी है किंतु कुरूड मंदिर समिति से जुड़े नंदानगर ब्लाॅक के लोग अपनी जिद्द पर अडें हैं। उनका मानना है कि नंदादेवी की उत्सव डोली इस आयोजन का हिस्सा बनती है और नंदादेवी ही अपने ससुराल हिमालय को जाती है। इसलिए इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। कुरूड़ के लोगों का मानना है कि नंदादेवी की यह मायके से ससुराल अथवा कैलाश जाने की यात्रा है। इस मसले को लेकर अब धार्मिक जगत में तरह-तरह की चर्चाएं छिड़ने लगी है। तटस्थ लोगों का कहना है कि यदि हर 12 वर्ष में राजजात आयोजित करने की परंपरा है तो इन परंपराओं को निवर्हन महाकुंभ अथवा अर्द्धकुंभ की तर्ज पर निर्धारित अवधि में क्यों नहीं किया जाता रहा है। इस मामले में तर्क दिया जा सकता है कि उच्च हिमालय तक जाने वाली यह यात्रा मौसमीय जोखिमों के कारण भी निर्धारित अवधि में टलती रही है किंतु इस यात्रा के धार्मिक पक्षधरों का मानना है कि मलमास अथवा अन्य कारण इसमें बाधा नहीं बन सकते हैं। बहरहाल मौजूदा साल की यात्रा पर मलमास का ग्रहण लग गया है किंतु इस यात्रा के आयोजन के मुहूर्त को लेकर अब धर्म क्षेत्र में बहस छिड़नी स्वाभाविक भी है।
