अब गांव-गांव सुलगने लगी शराब विरोधी आंदोलन की चिंगारी

रजपाल बिष्ट
गोपेश्वर। उत्तराखंड के पहाड़ों में इन दिनों शराब विरोधी आंदोलन की चिंगारी गांव-गांव तक सुलगने लगने लगी है। इसके चलते पियक्कड़ों की सामत भी आने लगी है। महिलाओं की इस तरह की मुहिम को अब हाथों हाथ भी लिया जाने लगा है।
दरअसल मौजूदा दौर में शराब ने गांव-गांव की कंदराओं तक पैर पसार लिए हैं। इसके चलते युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में तो आ ही गई है अपितु शराब ने पहाड़ों के आर्थिक तंत्र को खोखला कर रख दिया है। इस तरह के हालातों के चलते युवा पीढ़ी बर्वादी के कगार पर पहुंचने लगी है। हालातों को अभी से नहीं थामा गया तो भविष्य में युवाओं की सेहत ही दगा देते चली जाएगी। शादी ब्याह से लेकर अन्य कार्यक्रमों में शराब परोसने का कार्यक्रम अब लोगों की मान प्रतिष्ठा से भी जुड़ गया है। यही वजह है कि इस तरह के हालातों ने यहां के आर्थिक तंत्र को खोखला तो कर ही दिया है अपितु महिलाओं का जीना भी मुश्किल हो गया है। इस तरह के हालातों को देखते हुए उत्तराखंड के चमोली जिले के पैनखंडा ब्लाॅक की महिलाओं ने शराब विरोधी आंदोलन की मुहिम की शुरूआत की है। इसके तहत सामाजिक तथा अन्य कार्यक्रमों में शराब परोसने पर जुर्माने का प्रावधान किया है। यहां तक की हर रोज गांवों तक पहुंचने वाली शराब पर रोक लगाने की दिशा में कड़ी पहरेदारी भी करनी शुरू कर दी है। पैनखंडा के दर्जनों गांव में हर रोज शराब पर प्रतिबंध को लेकर नित नए फैसले महिलाएं ले रही है। पुरूष प्रधान समाज में हालांकि महिलाओं की हां में हां तो मिला रहा है किंतु पुरूषों के जरिए ही गांव शराब के अड्डे बन रहे हैं। पैनखंडा के गांव से शुरू हुआ यह आंदोलन दशोली और पोखरी ब्लाॅक के गांवों तक पहुंचने लगा है। दशोली ब्लाॅक के रोपा गांव की महिलाओं ने गांव तक शराब की आमद को लेकर आबकारी अधिकारी का कार्यालय घेर कर अपने इरादों को और मजबूत कर दिखा दिया है। कहा जा सकता है कि पहाड़ी गांवों में शराब विरोधी आंदोलन जगह-जगह सुलगने लगा है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े पेरोकार महिलाओं की इस पहल को हाथों हाथ ले रहे हैं। गांवों का सामाजिक तानाबाना शराब ने पूरी तरह ध्वस्त कर रख दिया है। यहां तक की हर चुनाव में शराब ही प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला कर रही है। इसके चलते योग्य प्रतिनिधियों के चयन बजाए शराब परोसने वालों की जय-जयकार हो रही है। यह स्थिति उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के लिए अच्छे संकेतों के रूप में सामने नहीं आ रही है।
वैसे भी पहाड़ों में सामाजिक बुराईयों से लेकर सामाजिक सरोकारों से जुड़े सवालों में महिलाएं ही केंद्र में रही हैं। गढ़वाल में राज्य बनने से पूर्व भी शराब ने पांव पसार दिए थे। इसके चलते 50 और 60 के दशक में टिंचरी के खिलाफ टिंचरी माई का आंदोलन आज भी याद किया जाता है। इस आंदोलन से काफी हद तक शराब पर प्रतिबंध लगा था। 80 और 90 के दशक में पहाडों में फिर शराब ने पैर पसारने शुरू किए। महिलाएं विरोध तो करती रही किंतु उनकी कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाई। महिलाओं के बल पर ही विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन निणार्यक दिशा में पहुंचा था। गौरादेवी इसी वजह आज भी याद की जाती है। 90 के दशक का उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन महिलाओं के बल पर ही लक्ष्य तक पहुंचा था। इस आंदोलन ने मुजफ्फरनगर कांड में महिलाएं ही उत्पीड़न का शिकार हुई थी। कहना न होगा कि महिलाओं के बदौलत ही यह राज्य हासिल हुआ। वैसे 2009-10 में पीपलकोटी में शराब के विरोध को लेकर कंडाली आंदोलन भी चला था। इस आंदोलन के चलते बंड पट्टी क्षेत्र में शराबियों की सांमत आ गई थी। इसके चलते काफी हद तक शराब पर रोक भी लगी। फिर पुरूष प्रधान समाज ने शराब को तरजीह देना शुरू किया तो पूरा ढांचा खोखलेपन का शिकार हो गया है। अब तो शादी ब्याह से लेकर अन्य आयोजनों में शराब परोसना हैसियत दिखाने का कार्यक्रम भी बन रहा है। यह स्थिति बता रही है कि खोखला होता सिस्टम नौनिहालों अथवा युवा पीढ़ी को बर्वादी की ओर धकेल रहा है। महिलाओं के इस आंदोलन को पुरूषों को भी कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना होगा। ऐसा नहीं किया गया तो भावी पीढ़ी बर्वाद तो होगी ही अपितु उत्तराखंड का भविष्य भी शराब के नशे में डुबा पड़ा मिलेगा। अब तो महिलाओं से सीख लेकर पुरूष प्रधान समाज को आगे कदम बढ़ाने ही होंगे। ऐसा नहीं किया गया तो भविष्य का उत्तराखंड रसातल में डुबा पड़ा मिलेगा।

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